Wednesday, 13 September 2017

Ghadeer me

हाथों को मल के रह गया बातिल ग़दीर में
दीने रसूल हो गया कामिल ग़दीर में

लो फखरे नूह मंज़िले मक़सूद आ गयी
कश्ती को आज मिल गया साहिल ग़दीर में

ऐसा चढ़ा खुमार विला की शराब का
ज़ालिम रहे न ज़ुल्म के क़ाबिल ग़दीर में

हैदर को जब क़रीब बुलाया रसूल ने
तीनों मुनाफ़िक़ों के जले दिल ग़दीर में

मातम मना रहे हैं कनारे खड़े हुए
कुफ़रो निफ़ाक़ो शिर्क के हामिल ग़दीर में

रहमत बरस रही है विला की ज़मीन पर
फ़क़ हो रहा है चहेरा ऐ बातिल ग़दीर में

शम्मे विला के नूर में डूबी है कायनात
महवे तवाफ़े शौक़ है बिस्मिल ग़दीर में

क़म्बर बिलाल बू ज़रो सलमाने फ़ारसी
आये हैं दूर दूर से आक़िल ग़दीर में

नामे अली पे शैख़ अगर एतेराज़ है
लाओ कोई अली के मक़बिल ग़दीर में

लो मुर्तज़ा के नाम का जामे विला पियो
हो जाओ शैख़ आज से दाख़िल ग़दीर में

सहरा की धूप देख के लगता है ये इरम
कर्बोबला का रंग है शामिल ग़दीर में

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